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मई, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पैसे की दौड़ में जिंदगी मत भूलो

पैसे की दौड़ में इंसान क्या खो देता है पैसा कमाते कमाते जिंदगी कैसे बर्बाद होती है परिवार को वक्त क्यों नहीं दे पाते लोग नौकरी और परिवार में बैलेंस कैसे करें जिंदगी में पैसे से ज्यादा जरूरी क्या है सोचो एक बार, सिर्फ एक बार। आपने पूरी जिंदगी काम किया। सुबह उठे, दफ्तर गए, शाम को थके-हारे लौटे। महीने के आखिर में तनख्वाह आई, कुछ खर्च हुआ, कुछ बचाया। फिर अगला महीना। फिर वही। तीस साल ऐसे ही निकल गए। और जब रिटायर हुए, तो पहली बार घर में बैठकर बाहर का नजारा देखा — और नहीं पता था कि अब क्या करें। जिंदगी जीना तो सीखा ही नहीं था कभी। यह सिर्फ आपकी कहानी नहीं है। यह हम सबकी कहानी है। एक दुकानदार है — रोज सुबह सात बजे दुकान खोलता है, रात दस बजे बंद करता है। बीच में एक बार घर जाता है खाना खाने। बच्चे सो जाते हैं जब तक वो आता है। बीवी अकेले बैठी रहती है। त्योहार आते हैं, वो दुकान पर होता है — क्योंकि त्योहार पर तो बिक्री ज्यादा होती है। उसने कभी नहीं सोचा कि त्योहार सिर्फ पैसे कमाने के लिए नहीं आता, वो इसलिए आता है कि तुम अपनों के साथ बैठो। एक नौकरीपेशा आदमी है — IT कंपनी में काम करता है। लैपटॉप...

क्या गरीबों और जानवरों को सताने वालों को कर्मों की सजा मिलती है?

हिन्दू धर्म में अहिंसा का क्या महत्व है क्या जानवरों को मारना पाप है हिन्दू धर्म के अनुसार क्या जीवों को कष्ट देने से बुरा कर्म बनता है क्या कर्म का नियम सच में काम करता है क्या गरीबों को अपमानित करना पाप माना जाता है हिन्दू धर्मग्रंथों में पशुओं पर दया क्यों सिखाई गई है कभी आपने देखा है कि कुछ लोग कितनी बेरहमी से कमजोर लोगों के साथ व्यवहार करते हैं? सड़क पर घूमते जानवरों को पत्थर मारना, गरीब आदमी का मज़ाक उड़ाना, किसी की मजबूरी का फायदा उठाना – जैसे यह सब कोई अपराध नहीं बल्कि एक साधारण बात हो। अजीब बात यह है कि यही लोग मंदिर भी जाते हैं, पूजा भी करते हैं, और भगवान के सामने सिर भी झुकाते हैं। लेकिन शायद वे यह भूल जाते हैं कि भगवान को फूल चढ़ाने से पहले इंसान को अपने कर्मों का हिसाब भी देना पड़ता है। हिन्दू धर्म की एक बहुत कठोर सच्चाई है – इस संसार में किया गया कोई भी कर्म बिना फल के नहीं रहता। जो दर्द तुम दूसरों को देते हो, वही दर्द किसी न किसी रूप में तुम्हारे जीवन में लौटकर आता है। कई लोग सोचते हैं कि अगर किसी गरीब या जानवर ने जवाब नहीं दिया तो बात वहीं खत्म हो गई। लेकिन धर्मग्रंथ कह...

ज्ञान ही असली ताकत है

ज्ञान क्यों जरूरी है जीवन में बच्चों में ज्ञान और समझ कैसे बढ़ाएं धर्म पर सवालों का जवाब कैसे दें आत्मविश्वास और ज्ञान का संबंध सही को साबित कैसे करें भारतीय संस्कृति और तर्क

हम अपने माता-पिता से “आई लव यू” क्यों नहीं कह पाते?

हम अपने पिता से भावनाएँ क्यों नहीं कह पाते? क्या पिता को बच्चों के प्रेम का एहसास होता है? मध्यमवर्गीय परिवारों में यह झिझक क्यों आम है? क्या देर से कही भावनाओं का भी महत्व होता है?

पिंजरे में बंद पंख: क्या हमें सच में पक्षियों से प्रेम है?

क्या पक्षियों को पिंजरे में रखना सही है? पक्षियों की स्वतंत्रता पर भावनात्मक लेख जानवरों के प्रति संवेदनशीलता कैसे बढ़ाएँ? पालतू पक्षी रखना सही या गलत? आज सुबह जब मैं अपनी बालकनी में खड़ा था और हल्की धूप सामने की इमारतों की दीवारों पर उतर रही थी, तब मेरी नजर सामने वाले फ्लैट की खिड़की पर पड़ी जहाँ एक छोटा-सा पिंजरा टंगा हुआ था और उस पिंजरे के भीतर दो हरे रंग के तोते बार-बार एक छोर से दूसरे छोर तक फुदक रहे थे, जैसे कोई अदृश्य दीवार उन्हें हर बार रोक देती हो और वे समझ ही नहीं पा रहे हों कि उनके पंख आखिर किसलिए बने हैं। उसी समय आकाश में कई चिड़ियाँ बेफिक्र होकर गोल-गोल चक्कर लगा रही थीं, हवा को चीरती हुई ऊपर उठतीं और फिर नीचे आतीं, मानो आसमान उनका घर हो और धरती उनका विश्राम-स्थल, लेकिन इन दो तोतों के हिस्से में केवल लोहे की सलाखें थीं, एक छोटा-सा डंडा था जिस पर वे बैठते थे, और एक कटोरी में रखा दाना था जो उनके जीवन की पूरी सीमा बन गया था। मैंने कुछ देर तक उन्हें देखना बंद नहीं किया, क्योंकि उनकी आँखों में एक बेचैनी थी जिसे शब्दों में बयान करना आसान नहीं है, वे बाहर उड़ती चिड़ियों को देख र...

अच्छे संस्कार और शिष्टाचार क्यों हमारी पहचान होते हैं?

  अच्छे संस्कार क्यों ज़रूरी होते हैं? शिष्टाचार किसी व्यक्ति की पहचान कैसे बनता है? बच्चों में अच्छे संस्कार कैसे विकसित करें? अतिथियों का सम्मान क्यों करना चाहिए? सामाजिक व्यवहार और पढ़ाई में क्या संबंध है? किसी को नज़रअंदाज़ करना क्यों गलत माना जाता है? नमस्ते और मुस्कान का क्या महत्व है? अच्छे व्यवहार से रिश्ते कैसे मजबूत होते हैं? बच्चों को शिष्टाचार कब और कैसे सिखाएँ? मोबाइल का बच्चों के सामाजिक व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?

साधु भूखा भाव का — कबीर का वो दोहा जो हर युग में सच है

साधु भूखा भाव का , धन का भूखा नाहीं। धन का भूखा जो फिरै , सो तो साधु नाहीं॥ — संत कबीरदास भाव और धन में क्या अंतर है असली साधु की पहचान कैसे करें कबीर के दोहे का आधुनिक अर्थ भाव से काम करने का महत्व कबीर की शिक्षाएं आज के जीवन में कबीर ने यह दोहा किसी पोथी में लिखने के लिए नहीं कहा था। यह किसी मंच से भाषण देने के लिए भी नहीं था। यह एक सीधी , कठोर , और बेशर्म सच्चाई थी जो उन्होंने उन लोगों के मुँह पर दे मारी थी जो धर्म का चोगा पहनकर समाज को लूट रहे थे। और अगर आज कबीर होते — तो शायद यही दोहा वो अस्पतालों के बाहर लिखवाते , नेताओं के दफ्तरों पर लगवाते , यूट्यूब चैनलों के होर्डिंग पर चिपकवाते , और शायद मंदिर की दीवारों पर भी। क्योंकि भाव की भूख आज भी दुर्लभ है। और धन की भूख आज भी सर्वव्यापी। लेकिन यह लेख सिर्फ उन्हें कोसने के लिए नहीं है जो बाहर से साधु दिखते हैं और भीतर से व्यापारी हैं। यह लेख उस इंसान के लिए है जो खुद से यह सवाल पूछने की हिम्मत रखता हो — कि मेरे अपने भाव कितने असली हैं ? पहले समझते हैं कि "भाव" का मतलब क्या है। भाव का मतलब सिर्फ भावना नहीं है , सिर्फ दया न...
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